महात्मा गाँधी - जीने की प्रेरणा देने वाला महामानव
- Buddy Tayari
- Dec 17, 2021
- 5 min read
Updated: Feb 2, 2022
महात्मा गांधीजी के संबंध में सोचता हूँ तो मुझे 'हाथी और सात अंधों की कहानी' याद आती है। जिस तरह उन सात अंधों को उनके स्पर्श से हाथी अलग-अलग रूप में अनभव हुआ वही बात महात्मा गांधी के संदर्भ में होती है।

यह वर्ष महात्मा गांधी का १५० वाँ जयंती वर्ष है। आज भी हम गांधीजी, उनके विचार और कार्य को पूर्णत: नाय नहीं सके । किसी को उनका रहन-सहन, किसी को के विचार, किसी को उनका स्वाधीनता संग्राम का त्व किसी को इस संग्राम में उनका अभूतपूर्व लोकसहभाग, अहिंसा और शांति के संदर्भ में उनके विचार, किसी को उनके भीतर बसा पत्रकार, किसी को उनके भीतर का अध्यात्मवादी रूप, किसी को गाँव की ओर चलने का उनका संदेश भाया तो किसी को खादी का समर्थन करने वाले, स्वयंपूर्ण ग्राम की संकल्पना प्रस्तुत करने वाले गांधीजी भाते हैं।
सत्यमेव जयते
कोई उनकी निडरता से परिचित है तो किसी को उनका संगठक का रूप प्रभावित करता है । इतना ही नहीं; किसी को उनके व्यक्तित्व से समाजकार्य की प्रेरणा मिलती है तो कुछ उन्हें 'जीने की शिक्षा देने वाले शिक्षक' मानते हैं । अनेकों के लिए तो महात्मा गांधीजी जीने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन है । बहुत-से लोग उनके शोषणरहित समाज के विचार पसंद करते हैं।
व्यक्तिगत जीवन में मूल्यों के प्रति समर्पित होने वाले गांधीजी भी अनेक लोगों को प्रभावित करते हैं। कोई उनका ‘विरोधियों को शस्त्र से नहीं, प्यार से जीता जा सकता है' वाला विचार पसंद करते हैं । संक्षेप में ; महात्मा गांधी किसी एक की सोच में समा सकने वाला व्यक्तित्व नहीं है ।
महात्मा गांधी नाम का एक विशाल वृक्ष है जो किसी एक व्यक्ति के आकलन के दायरे में समा नहीं सकता। __महात्मा गांधी का एक अन्य रूप भी है । सभी धर्मों तथा जातियों के बच्चों-बड़ों को, धनवानों-निर्धनों को, नगरीय तथा ग्रामीण सभी को महात्मा गांधी अपने लगते ह | दिहाड़ी मजदरी करने वाले अति निर्धन व्यक्ति को भी गांधीजी अपने में से एक लगते हैं तथा वे महात्मा गांधी को पिता के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले आदरसूचक 'मेरे बापू' शब्द से संबोधित करते हैं । किसी मामूली फकीर की तरह जीवन जीने वाले महात्मा गांधी के सम्मुख बड़े-से-बड़े धनवान भी शीश नवाते हैं । इसीलिए धनवान हो या निर्धन; सभी के लिए महात्मा गांधी वंदनीय हैं। महात्मा गांधी का एकमात्र धर्म था 'मानवता' । वे पूर्णत: धर्मनिरपेक्ष थे । राजनीति के संदर्भ में भी उनकी यही भूमिका थी । अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी मात्र भारत के लिए ही नहीं बल्कि विश्व के लिए वंदनीय हैं । आज भी विश्व के कई देशों में गांधी जयंती के अवसर पर उनके जीवन दर्शन को याद किया जाता है।
उनके विचारों को हम प्रत्यक्ष में उतार नहीं सके । - इसीलिए हमारे देश का प्रत्येक शहर नगरीय समस्याओं से ग्रस्त है । 'हरिजन' पत्रिका के माध्यम से महात्मा गांधी ने शोषणविरहित समाज का विचार प्रस्तुत करने के लिए आदर्श ग्राम की संकल्पना प्रस्तुत की । जुलाई १९४२ के 'हरिजन' अंक में महात्मा गांधी ने यही संकल्पना प्रस्तुत करते हुए ‘गाँव की ओर चलो' का विचार लोगों के सम्मुख रखा । साथ ही उन्होंने ‘गाँव को स्वयंपूर्ण होना चाहिए'; यह संदेश भी दिया । उनका कहना था कि गाँव के लोगों को अपनी आवश्यकताएँ स्वयं पूर्ण करने का प्रयत्न करना चाहिए । इतना ही नहीं; अपनी जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ एक-दूसरे को सहयोग भी करना चाहिए । इसके लिए वे सुझाव देते हैं कि कपास की फसल लेते हुए उससे सूत कातें तथा स्वयं चरखा चलाते हुए कपड़ों की आवश्यकताओं को पूर्ण करें । महिलाओं से भी उनका कहना था कि सूत कताई कर कपड़े बनाएँ, गाँव के लोगों को बेचें और अर्थार्जन कर अपने पैरों पर खड़े रहें । गांधीजी के शिक्षा के संदर्भ में भी विचार महत्त्वपूर्ण रहे हैं । गाँव में प्राथमिक शिक्षा को भी उन्होंने अनिवार्य माना है ।
वर्धा जिले के सेवाग्राम तथा अहमदाबाद की साबरमती नदी के किनारे बने आश्रम में महात्मा गांधी बहुत समय तक रहे । उस समय ये दोनों आश्रम शहरी क्षेत्र में नहीं थे । मिट्टी से जुड़ना गांधीजी को अपेक्षित था । आज भी असंख्य लोगों के लिए ये दोनों आश्रम मानवतावादी जीवन जीने के प्रेरणास्रोत हैं। जिस तरह महात्मा गांधी ने शांति और अहिंसा का समर्थन किया, उसी तरह वे निर्भय बने रहने के प्रति आग्रही थे । निर्भय होने का अर्थ स्वयंसिद्ध अथवा स्वयं तैयार रहना है । इस बात को बिना किसी भ्रांति-भ्रम के समझ लेना आवश्यक है । महात्मा गांधी का अहिंसा का मूलमंत्र विश्व को मोहित करने वाला सिद्ध हुआ है । आज भी संसार में कहीं हिंसा या क्रूरता की ज्वालाएँ धधक उठती हैं तो लोग महात्मा गांधी को याद करते हैं। आज भी उनका मानवता का दर्शन तथा मनुष्य के परस्पर द्वेष न करने के संदेश का स्मरण हो जाता है।
पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करते हुए मैं लगभग २५ वर्ष नागपुर में रहा । नागपुर से डेढ़ घंटे की दूरी पर वर्धा जिला है । इसी जिले में महात्मा गांधी के चरणकमलों से पुनीत हुआ सेवाग्राम आश्रम है । साल भर में दो-तीन बार वहाँ जाकर पेड़ के नीचे एक-दो घंटे शांति से बैठकर पढ़ने में आनंद और प्रेरणा की अनुभूति मिलती है । यह मेरा अनुभव रहा है। विभिन्न सेवा प्रतियोगिता परीक्षाओं में सम्मिलित होने वाले विद्यार्थी विविध विषयों पर संवाद स्थापित करने हेतु मेरे पास आते थे। उन युवाओं को लेकर मैं विविध विषयों पर चर्चा करने इस आश्रम में जाया करता । सेवाग्राम की जमीन, वहाँ की मिट्टी का प्रत्येक कण गांधीजी के पदस्पर्श से पुनीत हुआ है । इस पुण्यभूमि में होने वाली इन चर्चाओं को मानो गांधीजी सुन रहे हैं; इस भावना से हम अभिभूत हुआ करते थे।
पत्रकारिता के बहाने देश-विदेश में मेरा भ्रमण चलता रहा । किसी भी देश के विश्वविद्यालय या सामाजिक संस्था में जाता हूँ तो मैं अपना परिचय देते हुए यह कहता हूँ कि मैं महात्मा गांधी और आचार्य विनोबा भावे के सेवाग्राम तथा पवनार की भूमि से आया हूँ। ऐसा परिचय होने पर मेरा स्वागत और आतिथ्य अत्यंत सम्मानपूर्वक हुआ । मैं जिन-जिन देशों में गया हूँ, हर जगह महात्मा गांधी के प्रति उनकी आत्मीयता तथा स्नेह मुझे प्रतीत हुआ। ___जर्मनी की एक यात्रा के बीच अमानवीय अत्याचारों के जो यातनाघर हैं; उन्हें देखने का अनुभव आपको बताना चाहता हूँ । यहूदी (ज्यू) लोगों को जहाँ क्रूर और अमानवीय यातनाएँ दी गईं, वे यातनाघर उनकी यातनाओं के स्मारक हैं । उन यातनाघरों में दी गई यातनाओं और अत्याचारों की कहानियाँ क्रूरता की परिसीमा को भी लाँघ जाती हैं । उन यातनाघरों को देखते समय हम अंतर-बाह्य टूट जाते हैं । ऐसे ही एक यातनाघर को देखते समय हमारे आगे चलने वाली एक जर्मन महिला की आँखों में आँसू आ गए थे। जैसे उसके ही किसी रिश्तेदार को इन अत्याचारों का शिकार होना पड़ा था । चलते-चलते हमारे बीच की दूरी कम हो गई थी।
मैं अपने साथी के साथ हिंदी में वार्तालाप कर रहा _था । उसे सुनकर उस महिला ने मुझसे पूछा- आप भारतीय हैं? मेरे 'हाँ' कहने पर वह कहने लगी, “इसका मतलब आप महात्मा गांधी के देश से आए हैं।'' सेवाग्राम आश्रम का संदर्भ देते हुए मैंने कहा- “जी हाँ ।” “सच?" आश्चर्यचकित होकर उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया और गद्गद् होकर कहने लगी- “लगता है जैसे मैंने उस __ भूमि को स्पर्श कर लिया है।' इसके बाद हम आपस में बातचीत करते रहे । उसके दादा जी तथा माँ को उन अत्याचारों का शिकार होना पड़ा था । परिणामतः वह बचपन में ही बेघर, अनाथ हो गई थी । उस महिला ने महात्मा गांधी को पढ़ा था । लुई फिशर द्वारा लिखित गांधीजी की जीवनी उसके व्यक्तिगत पुस्तकालय में थी।
अंत में विदाई के दौरान उसने कहा, “आपके देश में महात्मा गांधी जैसे महामानव अवतीर्ण हुए इसलिए आपके माता-पिता ऐसी क्रूरता से बच गए ।' उस समय गांधीजी के विचारों से अभिभूत वास्तविक मानवता के दर्शन हुए और महात्मा गांधी जैसे महामानव के सम्मुख मैं नतमस्तक हो गया । इसीलिए मैं लिखता हूँ और कहता भी हूँ कि मानवता के पुजारी महात्मा गांधी के भारत में जन्म लेने पर मुझे गर्व है।
Hi